परिचय

जगजीत सिंह
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अपने प्रशंसकों में ‘गजल सम्राट’ के के नाम से मशहूर जगजीत सिंह का जन्म राजस्थान के श्रीगंगानगर में  फरवरी १९४१ को सरकारी कर्मचारी अमर सिंह धीमन और बचन कौर के यहां हुआ । उनकी चार बहनें और दो भाई थे । परिवार में उनका नाम जीत था । उनके जन्म के समय उनका नाम जगमोहन रखा गया था लेकिन उनके सिख पिता ने अपने गुरू की सलाह पर इसे बदलकर जगजीत कर दिया ।
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उनके पिता ने अपने पुत्र की प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना । उन्होंने नेत्रहीन संगीत गुरु पंडित छगनलाल शर्मा के पास जगजीत को संगीत सीखने भेजा ।
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बाद में सैनिया घराने के उस्ताद जमाल खान से उन्होंने छह साल संगीत की तालीम ली और खयाल, ठुमरी और ध्रुपद का ज्ञान पाया। जगजीत का मानना था कि संगीत प्रेरणा की वस्तु है प्रतियोगिता की नहीं । उनका कहना था, ‘‘जैसे ही आप संगीत में प्रतियोगिता लाते हैं, उसकी आत्मा मर जाती है ।’’
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उन्होंने कहा था; ‘‘संगीत एक व्यापक विषय है । संगीत में गणित और व्याकरण होता है । जब तक एक व्यक्ति सबकुछ जान नहीं लेता वह अच्छा गायक नहीं बन सकता । गजल गाने से पहले व्यक्ति को १५ वर्षों तक संगीत सीखना चाहिए ।’’
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उनके कुछ यादगार नगमों में ‘तुम इतना जो मुस्करा रहे हो’, ‘अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं’, ‘पहले हर चीज थी अपनी मगर अब लगता है अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं’ ‘झुकी झुकी सी नजर’, ‘कागज की कश्ती’ थे ।
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उन्होंने गुरुद्वारों में भजन गाकर अपने संगीत की यात्रा शरू की । उनके संगीत के जादू ने जालंधर के डीएवी कॉलेज में उनकी फीस माफ करा दी । आकाशवाणी, जालंधर में उन्हें व्यावसायिक तौर पर गाने का मौका मिला, जहां उन्हें कम पैसों पर साल में छह सीधे प्रसारण का प्रस्ताव दिया गया ।
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तब तक सफलता सपने की तरह थी । पाश्र्वगायकी में अपने सपने को तलाशने वह १९६१ में मायानगरी मुंबई पहुंचे लेकिन असफल प्रयासों ने उन्हें वापस जालंधर पहुंचा दिया । गजल सम्राट १९६५ में फिर सपनों की नगरी में पहुंचे और इस बार एचएमवी ने उनकी दो गजलों को रिकॉर्ड किया ।
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जगजीत सिंह का पाश्र्वगायिकी में संघर्ष तब भी जारी रहा और पैसे कमाने के लिए वह विज्ञापन फिल्मों और वृत्तचित्रों के लिए छोटे मधुर गीत तैयार करते रहे । ऐसी ही एक रिकॉर्डिंग के वक्त उनकी मुलाकात अपनी पत्नी चित्रा से हुई और १९७० में दोनों परिणय सूत्र में बंध गए, वही उनके जीवन के बदलाव का छण साबित हुआ ।
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१९७५ में एचएमवी ने जगजीत को उनके पहले एल्बम ‘द अनफॉरगेटेबल्स’ का प्रस्ताव दिया जिसमें जगजीत-चित्रा की गजलें थीं ।
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पारंपरिक सारंगी और तबले के साथ आधुनिक वाद्य यंत्रों को गजल गायिकी में लाने का श्रेय भी जगजीत को जाता है । उनका अगला एल्बम पंजाबी में ‘बिरहा दा सुल्तान’ था ।  इसके बाद चित्रा और जगजीत की जोड़ी का पहला एल्बम ‘कम एलाइव’ आया । इसके बाद दो और एल्बम आए और दोनों के कंसर्ट होने शुरू हो गए ।
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फिल्मों में भी उन्हें सफलता मिलनी शुरू हुई । १९८० में उन्होंने ‘साथ साथ’ फिल्म में जावेद अख्तर की गजलों और नज्मों को अपनी आवाज दी। उसी साल महेश भट्ट की फिल्म ‘अर्थ’ से जगजीत और चित्रा की प्रसिद्धि आसमान छूने लगी । फिल्म ने ‘तुम इतना जो मुस्करा रही हो’ जैसे सदाबहार गीत दिए ।
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जगजीत ने १९८७ में ‘बियोंड टाइम’ रिकॉर्ड किया । यह किसी भी भारतीय संगीतकार की पहली डिजिटल सीडी थी । गुलजार के टीवी सीरियल ‘मिर्जा’ में उनका गाना एक और मील का पत्थर साबित हुआ ।
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अपने पेशेवर जीवन में वह बुलंदियों को छू रहे थे, लेकिन तभी उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी हो गई जब १९९० में एक कार दुर्घटना में १८ साल का उनका इकलौता बेटा विवेक मारा गया ।
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दर्द ने मानो जीवन को विराम लगा दिया । चित्रा ने अपनी आवाज खो दी और कभी स्टेज पर दोबारा नहीं लौटीं लेकिन जगजीत अपने अवसाद से लड़े । पुत्र की मौत के बाद सिख गुरूवाणी पर आधारित ‘मन जीते जगजीत’ उनका पहला एल्बम था ।
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पद्मभूषण से सम्मानित गायक एकमात्र ऐसे गायक हैं जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं को अपने दो एल्बम नई दिशा (१९९९) और संवेदना (२००२) में अपनी आवाज दी ।

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