गरज-बरस प्यासी धरती पर, फिर पानी दे मौला;
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गरज-बरस प्यासी धरती पर, फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चों को, गुड़धानी दे मौला ।
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दो और दो का जोड़ हमेशा, चार कहाँ होता है
सोच-समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला ।
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फिर रौशन कर ज़हर का प्याला, चमका नयी सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला ।
(सलीब = सूली)
(ताबान = प्रकाशमान, चमकदार, चमकीला)
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फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा
फिर मन्दिर को को‌ई मीरा दीवानी दे मौला ।
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तेरे होते को‌ई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो
जीनेवालों को मरने की आसानी दे मौला ।
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-निदा फाज़ली
मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार;
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मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार
दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार ।
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छोटा करके देखिये, जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है, बाँहों भर संसार ।
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ले के तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से, बाहर निकले पाँव ।
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सब की पूजा एक सी, अलग अलग हर रीत
मस्ज़िद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत ।
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पूजा-घर में मूर्ति, मीरा के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी, उतने उसके दाम ।
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नदिया सींचे खेत को, तोता कुतरे आम
सूरज ठेकेदार सा, सबको बाँटे काम ।
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सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फ़क़ीर ।
 (पीर = सोमवार)
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अच्छी संगत बैठकर, संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से, मीठी हो गयी धूप ।
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सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास
पाना, खोना, खोजना, सांसो का इतिहास ।
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चाहे गीता बाँचिये, या पढ़िये कुरान
मेरा तेरा प्यार ही, हर पुस्तक का ज्ञान ।
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-निदा फाज़ली
बदला न अपने आपको जो थे वही रहे;
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बदला न अपने आपको जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे ।
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दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम
थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे ।
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अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे ।
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गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे ।
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हर वक़्त हर मकाम पे हँसना मुहाल है
रोने के वास्ते भी कोई बेकली रहे ।
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-निदा फाज़ली
ये ज़िन्दगी;
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ये ज़िन्दगी
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है ।
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ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है ।
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बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी
नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा ।
(शरारा = चिंगारी)
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सितारे तोड़ो या घर बसाओ
अलम उठाओ या सर झुकाओ ।
(अलम = सेना के आगे रहने वाला सबसे बड़ा झंडा)
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तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा ।
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ये खेल होगा नहीं दुबारा ।
ये खेल होगा नहीं दुबारा ।।
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-निदा फाज़ली
जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है;
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जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है ।
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जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है
हर जीवन, जीवन जीने का, समझौता होता है
अब तक जो होता आया है वो ही होना है ।
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रात अँधेरी भोर सुनहरी यही ज़माना है
हर चादर में दुख का ताना सुख का बाना है
आती साँस को पाना जाती साँस को खोना है ।
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-निदा फाज़ली
मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन;
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मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन ।
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सदियों-सदियों वही तमाशा रस्ता-रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं खो जाता है जाने कौन ।
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जाने क्या-क्या बोल रहा था सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर जाग रहा था जाने कौन ।
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वो मेरा आईना है या मैं उसकी परछाई हूँ
मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन ।
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किरन-किरन अलसाता सूरज पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन ।
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-निदा फाज़ली
अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये;
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अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये ।
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जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चिराग़ों को हवाओं से बचाया जाये ।
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बाग में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाये ।
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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये ।
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-निदा फाज़ली
चाँद से फूल से या मेरी ज़बाँ से सुनिये;
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चाँद से फूल से या मेरी ज़बाँ से सुनिये
हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिये ।
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सबको आता नहीं दुनिया को सजा कर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बाँ से सुनिये ।
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मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिये ।
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क्या ज़रूरी है के हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिये ।
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-निदा फाज़ली
तेरा चेहरा है आईने जैसा;
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तेरा चेहरा है आईने जैसा
क्यों न देखूँ है देखने जैसा ।
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तुम कहो तो मैं पूछ लूँ तुमसे
है सवाल एक पूछने जैसा ।
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दोस्त मिल जाएँगे कई लेकिन
न मिलेगा कोई मेरे जैसा ।
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तुम अचानक मिले थे जब पहले
पल नही है वो भूलने जैसा ।
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-पयाम सईदी
उसकी बातें तो फूल हों जैसे;
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उसकी बातें तो फूल हों जैसे
बाकी बातें बबूल हों जैसे ।
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छोटी छोटी सी उसकी वो आँखें
दो चमेली के फूल हों जैसे ।
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उसका हँसकर नज़र झुका लेना
सारी शर्तें क़ुबूल हों जैसे ।
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कितनी दिलकश है उसकी ख़ामोशी
सारी बातें फ़ुज़ूल हों जैसे ।
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-नवाज़ देवबंदी