ये बता दे मुझे ज़िन्दगी;
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ये बता दे मुझे ज़िन्दगी
प्यार की राह के हमसफ़र
किस तरह बन गये अजनबी ।
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ये बता दे मुझे ज़िन्दगी
फूल क्यूँ सारे मुरझा गये
किस लिये बुझ गई चाँदनी ।
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ये बता दे मुझे ज़िन्दगी
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कल जो बाहों में थी
और निगाहों में थी
अब वो गर्मी कहाँ खो गई ।
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न वो अंदाज़ है
न वो आवाज़ है
अब वो नर्मी कहाँ खो गई ।
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ये बता दे मुझे ज़िन्दगी
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बेवफ़ा तुम नहीं
बेवफ़ा हम नहीं
फिर वो जज़्बात क्यों सो गये

प्यार तुम को भी है
प्यार हम को भी है
फ़ासले फिर ये क्या हो गये ।
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ये बता दे मुझे ज़िन्दगी
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-जावेद अख़्तर

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