क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए;
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क्यों ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए
इतने हुए क़रीब कि हम दूर हो गए ।
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ऐसा नहीं कि हमको कोई भी ख़ुशी नहीं
लेकिन ये ज़िन्दगी तो कोई ज़िन्दगी नहीं
क्यों इसके फ़ैसले हमें मंज़ूर हो गए ।
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पाया तुम्हें तो हमको लगा तुमको खो दिया
हम दिल पे रोए और ये दिल हम पे रो दिया
पलकों से ख़्वाब क्यों गिरे क्यों चूर हो गए ।
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-जावेद अख़्तर

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