क्या भला है क्या बुरा है कुछ नहीं;
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अपना अपना रास्ता है कुछ नहीं
क्या भला है क्या बुरा है कुछ नहीं ।
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जुस्तजू है इक मुसलसल जुस्तजू
क्या कहीं कुछ खो गया है कुछ नहीं ।
(जुस्तजू = तलाश, खोज)
(मुसलसल = लगातार)
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मोहर मेरे नाम की हर शै पे है
मेरे घर में मेरा क्या है कुछ नहीं ।
(शै = वस्तु, पदार्थ, चीज़)
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कहने वाले अपनी अपनी कह गये
मुझ से पूछो कुछ सुना है कुछ नहीं ।
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कोई दरवाज़े पे है तो क्या हुआ
आप से कुछ माँगता है कुछ नहीं ।
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-अख़्तर नाज़मी

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