मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन;
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मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन ।
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सदियों-सदियों वही तमाशा रस्ता-रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं खो जाता है जाने कौन ।
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जाने क्या-क्या बोल रहा था सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर जाग रहा था जाने कौन ।
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वो मेरा आईना है या मैं उसकी परछाई हूँ
मेरे ही घर में रहता है मुझ जैसा ही जाने कौन ।
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किरन-किरन अलसाता सूरज पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन ।
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-निदा फाज़ली

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