दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई;
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दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई ।
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दिल में कुछ यूँ सँभालता हूँ ग़म
जैसे ज़ेवर सँभालता है कोई ।
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आईना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई ।
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पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछलता है कोई ।
(शजर = पेड़, वृक्ष)
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फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुग़ालता है कोई ।
(मुग़ालता = भ्रम, भूल)
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देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)
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दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई ।
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दिल में कुछ यूँ सँभालता हूँ ग़म
जैसे ज़ेवर सँभालता है कोई ।
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आईना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई ।
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पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछलता है कोई ।
(शजर = पेड़, वृक्ष)
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फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुग़ालता है कोई ।
(मुग़ालता = भ्रम, भूल)
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देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)
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