ये फ़ासले तेरी गलियों के हमसे तय न हुए;
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ये फ़ासले तेरी गलियों के हमसे तय न हुए
हज़ार बार रुके हम हज़ार बार चले ।
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ना जाने कौन सी मट्टी वतन की मट्टी थी
नज़र में धूल, जिगर में लिये गुबार चले ।
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ये कैसी सरहदें उलझी हुई हैं पैरों में
हम अपने घर की तरफ़ उठ के बार बार चले ।
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ना रास्ता कहीं ठहरा, ना मंजिलें ठहरीं
ये उम्र उडती हुई गर्द में गुज़ार चले ।
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)
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ये फ़ासले तेरी गलियों के हमसे तय न हुए
हज़ार बार रुके हम हज़ार बार चले ।
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ना जाने कौन सी मट्टी वतन की मट्टी थी
नज़र में धूल, जिगर में लिये गुबार चले ।
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ये कैसी सरहदें उलझी हुई हैं पैरों में
हम अपने घर की तरफ़ उठ के बार बार चले ।
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ना रास्ता कहीं ठहरा, ना मंजिलें ठहरीं
ये उम्र उडती हुई गर्द में गुज़ार चले ।
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)
Beautiful Song
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