कोई गेसू कोई आँचल हमे आवाज़ ना दे;.कोई गेसू कोई आँचल हमे आवाज़ ना दे,अब किसी आँख का काजल हमे आवाज़ ना दे,हम हे खामोश तो खामोश ही रहने दो हमे,कोई आहट कोई हल-चल हमे आवाज़ ना दे ।.हमने तन्हाइ को मेहबूब बना रखा है,रख के ढेर में शोलों को दबा रखा है ।.राख के ढेर को बिखरा गई जब तैज़ हवा,सुनी-सुनी सी फिजां ओ में धुँआ उठने लगा,आँच देने को उभर आई चिंगारी,ओर भडकता हुआ शोला भी नजर आने लगा,किस कदर आग को सीने में छुपा रखा है,रख के ढेर में शोलों को दबा रखा है ।.सोये जज़्बात को उकसा के ये क्या कर बैठे,आज हम जोश में यूँ आके ये क्या कर बैठे,तक रहे हे सभी हैरान निगाहों से हमे,हम भी हैरान हे, घबराके ये क्या कर बैठे,क्या हुआ था हमे क्यू होंश गवा रखा है,राख के ढेर में शोला को दबा रखा है ।.फिर पुकारा हे महोब्बत ने हमे क्या कीजे,दी सदा हुश्न की जन्नत ने हमे क्या कीजे,जिसके सा इश्क की अकसर हमे डर लगता था,छु लिया फिर उसी हसरत ने हमे क्या कीजे,हमने जज़्बात से दामन को बचा रखा है ।.राश आए ना कभी प्यार के हालात हमे,दिल के इस खेल में हर बार हुई मत हमे,क्या करेंगे, कहा जायेंगे किधर जायेंगे,दे गई जब भी दगा गर ये मुलाकात हमे,राख के ढेर में शोला को दबा रखा है ।.-मोहिंदर देहेलवी
ग़ज़ल विधा के आधुनिकीकरण, उसके नवीन और प्रयोगात्मक तरीके से प्रस्तुतिकरण के लिये जगजीत सिंह का नाम हमेशा ही पहली पंक्ति में रहेगा । बौद्धिजीविक दुनियाँ का मनोरंजन मानी जानी वाली गज़लों को आम जन की पसंद तक उन्होंने ही पहुँचाया था । अपने प्रशंसकों में ‘गजल सम्राट’ के नाम से मशहूर जगजीत सिंह का जन्म राजस्थान के श्रीगंगानगर में ८ फरवरी १९४१ को श्री अमर सिंह धीमन और बचन कौर के यहां हुआ । जन्म के समय उनका नाम जगमोहन रखा गया था लेकिन उनके पिता ने अपने गुरू की सलाह पर इसे बदलकर जगजीत कर दिया ।
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