शाम से आँख में नमी सी है;
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शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है ।
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दफ़्न कर दो हमें के साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है ।
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वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
इस की आदत भी आदमी सी है ।
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कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है ।
(तस्लीम = सलाम, प्रणाम, हामी)
(लाज़मी = आवश्यक, अनिवार्य, ज़रूरी)
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)
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शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है ।
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दफ़्न कर दो हमें के साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है ।
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वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
इस की आदत भी आदमी सी है ।
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कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है ।
(तस्लीम = सलाम, प्रणाम, हामी)
(लाज़मी = आवश्यक, अनिवार्य, ज़रूरी)
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)
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