वो ख़त के पुर्ज़े उड़ा रहा था;
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वो ख़त के पुर्ज़े उड़ा रहा था
हवाओं का रुख़ दिखा रहा था ।
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कुछ और भी हो गया नुमायाँ
मैं अपना लिक्खा मिटा रहा था ।
(नुमायाँ = प्रकट)
.
उसी का ईमाँ बदल गया है
कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था ।
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वो एक दिन एक अजनबी को
मेरी कहानी सुना रहा था ।
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वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था ।
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)
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वो ख़त के पुर्ज़े उड़ा रहा था
हवाओं का रुख़ दिखा रहा था ।
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कुछ और भी हो गया नुमायाँ
मैं अपना लिक्खा मिटा रहा था ।
(नुमायाँ = प्रकट)
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उसी का ईमाँ बदल गया है
कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था ।
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वो एक दिन एक अजनबी को
मेरी कहानी सुना रहा था ।
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वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था ।
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)
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