ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तनहा;
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ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तनहा
काफ़िला साथ और सफ़र तनहा ।
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अपने साये से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस कदर तनहा ।
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रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तनहा ।
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दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तनहा ।
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हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर न जाने गए किधर तनहा ।
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)

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