आँखों में जल रहा है क्यूँ ? बुझता नहीं धुआँ;
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आँखों में जल रहा है क्यूँ ? बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ ।
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चूल्हें नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये हैं अब, उठता नहीं धुआँ ।
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आँखों के पोंछने से लगा आँच का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ ।
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आँखो से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमाँ ये घर में आये तो, चुभता नहीं धुआँ ।
(मरासिम = मेल-जोल)
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-गुलज़ार (समपूरन सिंह कालरा)

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